परमात्मा से सच्चा प्रेम ही नि:स्वार्थ भक्ति : सतीश

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  • निरंकारी मिशन का ध्येय जीवन का कल्याण
  • जमुई में संत निरंकारी सत्संग का आयोजन

जमुई ( बिहार) : भक्ति वह अवस्था है , जो जीवन को दिव्यता और आनंद से भर देती है। यह न इच्छाओं का सौदा है न स्वार्थ का माध्यम। सच्ची भक्ति का अर्थ है परमात्मा से गहरा जुड़ाव और निःस्वार्थ प्रेम।संत निरंकारी मंडल के केंद्रीय प्रचारक सतीश चंद्र दुबे ने श्रीकृष्ण सिंह स्टेडियम में आयोजित सत्संग में भक्ति की महिमा का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रह्मज्ञान भक्ति का आधार है।

यह जीवन को उत्सव बना देता है। भक्ति का वास्तविक स्वरूप दिखावे से परे और स्वार्थ व लालच से मुक्त होना चाहिए। जैसे दूध में नींबू डालने से वह फट जाता है , वैसे ही भक्ति में लालच और स्वार्थ हो तो वह अपनी पवित्रता खो देती है। केंद्रीय प्रचारक ने उदाहरण देते हुए कहा कि भगवान हनुमान जी , मीराबाई और बुद्ध भगवान का भक्ति स्वरूप भले ही अलग था , लेकिन उनका मर्म एक ही था-परमात्मा से अटूट जुड़ाव। भक्ति सेवा , सुमिरन , सत्संग और गान जैसे अनेक रूपों में हो सकती है , लेकिन उसमें निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण का भाव होना चाहिए। गृहस्थ जीवन में भी भक्ति संभव है , यदि हर कार्य में परमात्मा का आभास हो।

उन्होंने सुदीक्षा जी महाराज के जीवन को भक्ति और समर्पण का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि इन विभूतियों का जीवन भक्ति और सेवा का श्रेष्ठ उदाहरण है। यह प्रेरणादायक विचार लोगों को आत्मसात करना चाहिए। उन्होंने उनके ब्रह्मज्ञान का वर्णन करते हुए कहा कि संत निरंकारी मिशन का एकमात्र ध्येय निरंकार परमात्मा से साक्षात्कार कराकर मानव जीवन का कल्याण करना है। निरंकारी मिशन मानव को मानवीय गुणों से लैस करना सिखाता है। इसका उद्देश्य मानव में सहनशीलता , विनम्रता , प्यार और अमन-चैन स्थापित करना है। दुबे जी ने कहा कि ज्ञान के दिव्य चक्षु से संत महात्माओं को संसार का हर प्राणी उत्तम और श्रेष्ठ दिखाई देता है।

परमात्मा एक हैं। वे ही इस संसार को चला रहे हैं। बिना गुरु के परमात्मा से भेंट असंभव है। सत्संग में आने से मानव को परमात्मा को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होती है। सत्संग में आकर ही सच्चे गुरु का ज्ञान संभव है। भक्ति का मार्ग अलग हो सकता है पर मंजिल एक ही है , परमात्मा को प्राप्त करना। केंद्रीय प्रचारक ने इंसानियत और रूहानियत का पाठ पढ़ाया। एक को जानकर , एक को मानकर और एक होकर भक्ति करनी होगी तभी परमात्मा से साक्षात्कार संभव है। निरंकारियों की पहचान उनके इंसानियत वाले गुण , व्यवहार और आचरण से होता है। सत्संग में श्रद्धा और भक्ति की अनुपम छटा देखने को मिली। इस पावन अवसर पर संतों के तप , त्याग और ब्रह्मज्ञान के प्रचार-प्रसार में उनके अमूल्य योगदान को स्मरण किया गया और उनके जीवन से प्रेरणा ली गईं।

समागम के दौरान अनेक वक्ताओं , कवियों और गीतकारों ने विभिन्न विद्याओं के माध्यम से गुरु महिमा और भक्ति का भावपूर्ण वर्णन किया। संतों की प्रेरणादायक शिक्षाओं ने श्रद्धालुओं के जीवन को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से समृद्ध किया। निरंकारी मिशन का मूल सिद्धांत यही है कि भक्ति परमात्मा के तत्व को जानकर ही सार्थक रूप ले सकती है। निःसंदेह सतगुरु माता जी के अमूल्य वचन श्रद्धालुओं के जीवन में ब्रह्मज्ञान द्वारा भक्ति का वास्तविक महत्व समझने और उसे अपनाने की प्रेरणा देता है।

जिला संयोजक ओंकार दास ने सत्संग के आयोजन में धर्मानुरागियों के सहयोग के लिए आभार जताया। सत्संग के अंत में महाप्रसाद परोसा गया , जिसका स्वजनों ने जमकर रसास्वादन किया। इस पावन अवसर पर बड़ी संख्या में भक्तजन उपस्थित थे।

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